پيمان آزادی |
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" سطری از شعر "سردار پير" مجموعهی " گذربان |
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هديهی صدمين سالروز تولد دکتر مصدق |
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نامت |
گواهی آزادی ست |
.چونان که زندگيت |
،صدای گامهای تو در معبر ِ خونين ِ آزادی ِ ميهنم |
طنين ِ سرود ِ مقاومتی ست که قدمهای رهروان را |
،مُنظّم میکند |
.و راه را بيدار نگاه میدارد |
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!رهپوی سالخوردهی آزادی |
!صدساله مرد |
همراه با بهار ِ رهايی به تهنيت ِ زاد روز ِ تو آمده ايم |
با خرمن |
خرمن |
شقايق ِ پَرپَر |
به تهنيت ِ تو که آزادی را مَوهبتی همزاد ِ آدمی باور |
،داشتی |
.خود اگر دوست بود يا دشمن |
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!رهپوی پير ِ بسته به زنجير |
،تا در بهار ِ آزادی تنفسی کنيم |
.از فصلهای کبود و تاريک ِ شکنجه و زندان گذر کردهايم |
!ديدی پدر چگونه میگذرانديم |
چندان که از پس ِ پُشت ِ ديوارهای بلند ِ قلعهی زندانت |
،میتوانستی شنيد |
!نسيمها به زمزمه از توفانهای در راه خبر میدادند |
وچندان که در آسمان ِ محصور ، طلوع ستارگان را |
، نگران میبودی |
،خورشيدهای خشم ِ فرزندان ِ جوانت |
- فرزندان ِفدايی و مجاهدت - |
چنان به انفجار |
، شبستان ِ اين ميهن را ستاره باران میکرد |
.که اهريمن دل میترکاند |
.و خلق دل میيافت |
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،ديدی پدر چگونه جوانانت |
!شب را به صبح رساندند |
اينان که خون ِ پاک ِ جوان شان |
چندان در آينهی آسمان ايران تابيد |
که شفق شرمگين شد |
و زمزمهها فرياد |
و فريادها ، توفان |
و آنگاه |
،سيل ِ عظيم ِ خلق به راه افتاد |
!نابودی ِ تمامی يک دوره را |
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نامت |
پيمان ِ آزادی ست |
!صد ساله مرد |
!ای به آزادی زيسته و در زنجير جان سپرده |
،بُن ريشهی درخت ِ مبارک ِ هزار ميوهی آزادی |
،که تواش پرورده بودی |
،و آذرخش ِ کينهی غارتگرانش سوخته بود |
.سيراب شد چُنان ز خون جوانان که باز ، شاخه بر آورد |
اينک به پاسداری ِ اين نو دميده آرزوی ديرين |
اين نوبرانه |
اين وديعهی خون ِ هزار هزاران شهيد |
به جان ايستادهايم |
، هم اگر چند |
!اين نودميده ، خون ِ تازه بخواهد |
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نعمت آزرم |
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مشهد – ٢٨ارديبهشت ٥٨ |
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