اندوهگزاری |
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!ناقوس ِ شرق را بنوازيد |
بر رَغم ِ اين حصار ِ سکوت آجين |
اعلام سوگواری ِ سردار ِ پير را |
از عرش سای قُلّهی پامير |
برج ِ بلند قامت ِ باروی آسيا |
آواز در دهيد که : سردار ِ پير ِ شرق |
،آرندهی صحيفهی آزادی |
،دارندهی رسالت ِ خود جوشی |
،روبندهی بساط ِ چپاولگران غرب |
- دزدان بازگشتهی دريايی - |
سردار ِ پيری بسته به زنجير |
.جان سپرد |
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ناقوس ِ شرق را بنوازيد |
ارّابه ران ِ مرگ نمیداند |
اينک کدام حجمی شرف را |
.تازان به سوی معبد ِ تاريخ میبرد |
!ناقوس ِ شرق را بنوازيد |
!ارّابه ران مرگ |
ارّابه ران درنگ کن |
!ارّابه ران |
سردار شرق را |
اين سان در اين سکوت کجا میبری!؟ |
لختی درنگ کن |
!ارّابه ران |
!منگر به اين خموش ِ مُسخّر |
آنک |
از دورتر سواحل ِ اروند |
تا بيکران ِ آن سوی آمويه |
!اين آسياست اينک |
در جامهی سياه |
اينک فضای شرق |
پر از صيحه و خروش |
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ارّابه ران |
!درنگ کن |
!ارّابه ران مرگ |
بگذار ابر ِ تيرهی اسفند |
اين قامت ِ بلند ِ به زنجير بسته را |
با بُغض ِ گرم ِ خويش بشويد |
،بگذار برف |
برف پَر افشان |
اين حجم ِ استواری و پاکی را |
.با حُلّهی سپيد ، کفن دوزد |
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!ناقوس ِ شرق را بنوازيد |
در مرگ هم |
سردار ِ پير زندگی از سر گرفته است |
مرگش – چنانکه زندگی اش – بارور |
بيم ِ حضور ِ خاطره اش حتّی |
چندان که مويه کردن |
. بر او مجاز نيست |
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سردار ِ پير اکنون |
زنجير را به خاک بدل کرده ست |
سردار پير ، اما |
"انديشناک مانده به فرجام کارزار" * |
تا کی بُلوغ ِ همت ِ ياران |
"ز آوردگاه مژدهی پيروزيش دهد " |
او را به نسيم پيامی ست |
با چشم ِ هر ستاره نگاهی ست |
.با بانگ ِ هر درخش غريوی ست |
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!ناقوس ِ شرق را بنوازيد |
!در سوگت ای پدر |
اين درد را به که گويم |
:دانسته نيست با که توان گفت |
! تسليت |
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سردار پير! تسليتم باد |
با اين غمان ِ تازه به تازه |
.سردار پير! تعزيتم باد |
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نعمت آزرم |
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مشهد – ٢٨اسفند ٤٥ |
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